मानव

मानव

मानव तुम क्या हो?
देवता का वरदान
या कर्मों का अभिशाप
अपने प्रारब्धों का परिणाम
या इच्छाओं का इंद्रजाल
क्या तुम्हे ज्ञात है?

एक सुनहरी मृगतृष्णा
जो खींच रही है निरंतर 
अतृप्त प्यास की ओर
और तुम बंधे जाते हो
उस अनदेखे अनटूटे 
गतिशील चक्कर में।

क्या तुमने सोचा है
ऐसा क्यूँ है
सोंचो और खोजो
मानव क्या तुम हो?

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